the castle of words

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the chapters of life

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Thursday, 11 December 2014

मुज़फ्फरनगर दंगों के पन्नों से 

"अरे भाई साहब, ये मलकपुर का रास्ता किधर है?" 


भाईसाहब जो अपने काम में व्यस्त थे, नज़र उठा कर हमारी तरफ देखे और बोले  "मलकपुर जाउग्गा या और कहीं जाउग्गा ?"

Mudassir भाई बोले ,"वहां जो दंगा पीड़ितों के कैम्प हैं वहां जाना है।" 
" जब तू यहााँ से सीद्धे जाउग्गा तो सीद्धे हाथ पे कैराना बाईपास पे मुड़ जाइयो, आग्गे चल के झिंझाना वाला चौराहा आवैग्गा, उस पे ना मुड़  के उसके आग्गे वाले चौराहे से सीद्धे हाथ पे जब मुडैग्गा तो मलकपुर पहुँच जाउग्गा।" 

हमने धन्यवाद बोलते हुए मोटर साइकिल में किक मारा और मुदस्स्सर भाई को पीछे बिठा कर निकल पड़े । रास्ते भर हम और मुदस्स्सर भाई मुंबई से लेकर मुज़फ्फरनगर की चरचा करते रहे और भाईसाहब ने जो रास्ता बताया उसी हिसाब से चलते चले गए। बीस मिनट बाद हम अपनी मंज़िल पर पहुाँच चुके थे। लगे हुए तम्बूओं की तरफ मोटर साइकिल मोड़कर हमने खड़ी की, तो उसी तम्बू से एक लड़की आशमां आकर निकल खड़ी  हुई। 


पंद्रह साल के लगभग उम्र रही होगी उसकी, सुन्दर सा चेहरा लेकिन उस चेहरे पर दंगों की यादों की लकीरें साफ़ दिख रहीं थीं और उस चेहरे की चमक उसमें कहीं खोती जा रही थी। ये वक़्त उसके यौवन की दहलीज़ पर पैर रखने का था और मुक्त पंछी की तरह जीवन के  सबसे हसीन वक़्त को जीने का था, उस वक़्त में वो अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर अपनी स्वाभिमान भरी ज़िंदगी जीने के लिए हालातों से जूझ रही थी। 

उसने आाँखों में चमक भरते हुए हम दोनों को नमस्कार किया और तुरन्त खाट बिछा कर हमको कहा, "आओ भाई साहब बैठो", और तंबू में अन्दर जाकर कुछ अपनी माँ से पूछने लगी। थोड़े ही देर में बाहर आकर बोली कि भाईसाहब क्या लाऊं चाय या पानी? तंबू के अन्दर मेरी नज़र पहले ही जा चुकी थी, सारे बरतन उलटे रखे हुए साफ़ नज़र आ रहे थे। मन ही मन सोचने लगा कि ये अतिथि सत्कार की भारतीय परम्परा भी कितनी अजीब है। ये लड़की और इसका परिवार बमुश्किल ही अपना खाना पीना चला पा रहे हैं लेकिन  इन हालातों में भी ये अपनी परंपरा नहीं भूले। 

हमने द्रवित हृदय से कहा कि नहीं नहीं अभी हम खाना खाकर ही आ रहे हैं, इन सब की कोई जरुरत नहीं। 

आशमां ने हमसे आने का कारण पूछा। मुदस्स्सर भाई, जो कि पहले से ही उस क्षेत्र में सात आठ महीने से काम कर रहे थे, उन्होंने जवाब दिया कि ये मुंबई से आये हुए हैं और दंगा प्राभावित लोगों पर  रिसर्च कर रहे हैं तो आप सबसे कुछ बात करना चाहते हैं।
वो लड़की और कैंप के बाकी लोग मेरे जैसे लोगों के आदी हो चुके थे, हर रोज़ वहाँ कोई ना कोई आता ही रहता था और हमेशा की तरह कुछ ना देकर बस तसल्ली देकर चला जाता था। मैं भी अपने मन में सोच रहा था कि मैं भी आज इनको फिर तसल्ली देकर ही जाने वाला हूाँ। लेकिन लोगों की उम्मीदें इतने दिनों बाद भी बरक़रार थीं कि शायद किसी रोज़ तो ऊपर बैठा खुदा उनकी सुन ही लेगा। धर्म को वाम पंथी लोगदुनिया भर की गालियाँ देते हैं। बाकी इस धर्म ने कुछ दिया हो या ना दिया हो पर एक बात तो माननी ही पड़ेगी , बुरे वक़्त में भी जीने का हौसला और सब कुछ अच्छा होने की उम्मीद इन धर्मोँ ने जरुर दी है।

 उस लड़की ने चप्पल पहनते हुए और दुप्पट्टा सम्भहालते हुए हमसे कहा किचलिए , मैं मिलवाती हूँ सबसे आपको। और हम उसके पीछे चलने लगे। चलते चलते तंबुओं के बीच में पहुंचे, वहाँ आशमां ने जो लोग वहां थे उनको हमारे बारे में बताया। एक दादी जैसी उम्र की महिला ने एक खुले से तंबू के अन्दर एक चटाई डाल कर हमको बैठने के मलए आमंत्रित किया । हम अपना झोला रखकर वहीं बैठ गए, और बाकी सारे लोग भी हमें वहीं घेरकर बैठ गए। भयावह अतीत की बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो दादी ने अपनी ना भूलने वाली यादों की किताब के पन्ने खोलना शुरू किया। 


कहना शुरू किया कि जी हमारे गाँव में ऐसा होगा हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था। जाट, मुसलमान सब एक ही थाली में खाना खाते थे। हम को लगता था कि कहीं भी होजायेगा पर हमारे यहााँ ऐसा नहीं होगा। 

हमको खबर मिली थी कि कुछ गाँव में आग लगा दी गयी है और कई लोग मारे गए हैं। हमारे गााँव के जाटों ने कहा कि तुम चिंता ना करो अगर यहााँ कोई आयेगा तो पहले हम मरेंगे उसके बाद ही आपको कोई हाथ लगाएगा, हम तो साहब तसल्ली और खुदा का नाम लेकर अपने घरों में इंसानियत के लिए काली रात का निकलने का इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद ही बगल वाले गााँव से आवाज़ें आने लगीं कि आ गए आ गए। गोलियां चलने की आवाज़ आने लगी। हम सब इधर से उधर दौड़ने लगे। जो जैसा था वैसे ही अपने दूध पीते बच्चों को गोद में लेकर जाटों के घरों की तरफ दौड़ने लगे। कुछ जाटों ने पनाह दी और कुछ जाटों ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। तब गााँव के प्रधान जो की जाट ही थे निकल कर आये और दंगाइयों और हमारा बीच आकर खड़े  हो गए। उन्होंने अपने घर और घेर (मवेशी बााँधने की जगह) में हम सब लोगों को पनाह दी और कहा की चिंता मत करो जब तक मैं हूँ  तब तक तुम लोगों को कुछ नहीं होगा। रात भर दंगाइयों और प्रधान के बीच तीखी बहस होती रही। थोड़े  देर बाद वो दंगाई वहां से चले गए। तो प्रधान जी के फ़ोन पर बार बार धमकी भरे कॉल आने लगे कि इन सब लोगों को अपने घर से निकालो नहीं तो अच्छा नहीं होगा। 

आखिरकार स्थिति बिगड़ते देख रात को तीन चार बजे प्रधान जी ने हम सबको बोला कि मैं अब ज्यादा देर तक इन लोगों को रोक नहीं पाउाँगा। और अपने घर में तुम लोगों का खून होते देख नहीं पाऊंगा। अच्छा यही होगा कि आप सब लोग कहीं सुरक्षित जगह पर चले जाओ। सब लोग अपने बच्चों को लेकर और बस तन पर कपडे पहन कर वहााँ से निकल पड़े और यहाँ मलकपुर आकर रुके।


 आसिफ़ मियाँ बताने लगे कि उन सब लोगों के खाने का इंतज़ाम सबसे पहले मलकपुर के हिन्दुओं ने हीकिया , मंदिर पर जो भंडारा होता था उसका सारा खाना कैंप में आने लगा, और धीरे धीरे कई लोगों ने राहत का  सामान देना शुरू किया। उसके बाद पूरे हिन्दुस्तान से राहत का सामान और लोग आना शुरू हुए। 

अकरम भाई और एक दो लोगों ने कैंप के देखभाल की ज़िम्मेदारी ले ली। और जो भी राहत का सामान आता था उसमें जो घटिया सामान होता था उसको बंटवा देते थे और बाकी सामान को बाज़ार में बिकवा कर पैसा कमाना शुरू करदिया । अगर कोई पैसा देकर गया तो वो सब ये लोग खा गए। सुनकर लगा कि इतने वक़्त से मैं सुनता आ रहा था कि दंगा जाटों या हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच हुआ था, दो धर्मों के बीच हुआ था। वो सब तो गलत था, यहाँ तो माज़रा कुछ और ही था। यहाँ तो कुछ जाट लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपने धर्म के हक़ को अदा करते हुए अपनी जान पर खेलकर अपने भाइयों को बचाया। और कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने इसी धर्म,की आड़  लेकर अपनी हैवानियत और राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए अपने ही भाइयों को मौत के घाट उतार दिया और उन्हें अपने घर से बेघर करदिया । और दूसरी और कुछ मुसलमानों ने जोकि बेघरों के लिए रहनुमा होने का दावा कर रहे थे उन्होंने बेघरों के जीने के लिए जो जरुरी सामान आया था उसको भी बेच खा गए। जिसकी वजह से भी कई मौत हुईं, कई बच्चे ठण्ड की वजह से दुनियादारी समझने से पहले ही दुनिया से चले गए। हैवानियत और इंसानियत कभी भी किसी धर्म की नहीं होती।

 जिसको अपनी हैवानियत और राजनितिक जरूरतें पूरी करनी है वो या तो धर्म नहीं तो किसी और चीज़ का सहारा लेकर लोगों की जान से ऐसे ही खेलता रहेगा। ना जाने वो दिन कब आएगा जब ये लोगों के खून की होली खेलने वाले दरिंदे नेता अपने हैवानियत के चोले से बाहर निकल कर इंसानियत के लिए काम करेंगे। मुदस्स्सर भाई ने चलने केलिए बोला, हम दोनों भारी मन से मोटर साइकिल स्टार्ट करते हुए वहााँ से निकल आये और छोड़ आये उनको फिर से खुदा के भरोसे कि एक ना एक दिन तो वो इनकी सुन ही लेगा। 


मधुसूदन सिंह 

Madhusudhan Singh is a II year student of Disaster Management at TISS, Mumbai

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