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Friday, 30 August 2013

संकरी गलियों का समाज: वकार उस्मानी


 
Image source: http://www.openthemagazine.com/article/nation/the-weaver-waiver

उत्तर प्रदेश सर्वाधिक छोटे नगरों वाला प्रदेश है . इनही नगरों में से एक है मऊ नाथ भंजन जो अनेक कारणों से राजकीय राजनितिक पटल पर एक खास विशेषता रखता है. अपने स्वरुप के अनुरूप ही इसकी वर्तमान व्यस्था है. नगर का मुस्लिम बहुल होना इसे एक स्वभाव देता है जिसने राजनितिक आकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए इसे क्षेत्रिय प्रयोगशाला बना डाला है. सत्तर प्रतिशत बुनकरों वाला ये नगर अपने भविष्य को इस वर्तमान में सुनिश्चित करने में अयोग्य पाता है. समस्याओं के अम्बार झेल रहे इस नगर में वर्तमान में अब केवल बिजली ही एक मात्र समस्या नहीं है पर ये ज़रूर है की यही एक समस्या अन्य समस्याओं को पनपने में योगदान दे रही है. बिजली लूमो में जान भरती है जो स्वाभाविक रूप से नगर की प्राथमिक प्रवृत्ति को निखार देती है. ये बिजली ही लूमो की खटर पटर के माध्यम से एक जटिल सामाजिक सम्बन्ध को जन्म एवं बढ़ावा देती है जो नगर के वाणिज्यिक विकास एवं सौहार्दता को बल प्रदान करती है. लूमों की गति विशेषतः बटे हुए समाज को बाधने का प्रतीक है क्योंकि इस पूरे वाणिज्यिक तंत्र में जहाँ साडी उत्पादन कुशल मुस्लिम कारिगर एवं घराने करते हैं तो धागे एवं कच्चे माल की बेहतर खेप की आपूर्ति एक कुशल हिन्दू बनिया व्यसायी ही सुद्रिड करता है. उसी प्रकार से साडी की डिजाइनिंग और ग्राफ एक मुस्लिम करता है तो पट्टा कटाई एक कुशल हिन्दू कारीगर करता है एवं सबसे महत्वपूर्ण है ख़राब हुए लूम मशीन को सही करने वाले कारीगर जो कि जकाट तकनीशियन के नाम से प्रसिद्ध हैं केवल हिन्दू ही हैं

आज़ादी के बाद दंगो की विभीषिका झेले हुए और विशेष रूप से बटे समाज में विकास की राजनीति मानो दम घोट रही हो. दिशाहीन सरकारी नीतियों के दुस्साहसी नतीजे कभी भी क्षेत्रिय दैनिक में बहस का मुद्दा नहीं बनते बल्कि राजनितिक द्वेष पुर्ण सामाजिक पुनः वर्गीकरण का सधा हुआ प्रयास किया जाता है. (मुख्य धारा ?) अंग्रेजी मीडिया के पढने वाले कम है इसलिए वो कोई प्रयास नहीं करते

केवल मऊ ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत के छोटे कस्बो की मुस्लिम नारीयों की दशा पर बहुत कम लिखा एवं समझा जाता है और इसके लिए क्षेत्रिय बुद्धजीवी वर्ग सर्वाधिक जिम्मेदार है. मुझे व्यक्तिगत रूप से मऊ जाने का अवसर अपने स्नात्कोत्तर शोध के सिलसिले में मिला

मऊ की महिलाएं जिनमे अधिकतर अंसारी मुस्लिम समाज की होती हैं कई प्रमुख कारणो से विशेष हैं क्योंकि इनका रहन सहन, शिक्षा एवं इनका घरेलू वस्त्र उत्पादन में मुख्य भुमिका उन्हें अपने पुरुष प्रधान समाज में एक विशेष स्थान देता है. यहाँ शिक्षा सबके लिए समान है और वो है मदरसे जिसमे मुख्यतः सभी बुनकर लड़कियां शिक्षा पाती हैं. कुछ गिने चुने कॉलेज हैं पर मदरसों की कम लागत एवं धार्मिक शिक्षा देने की प्रबल भावना इन्हें इससे बेहतर विकल्प की ओर अग्रसर नहीं करती. अधिकांश लड़कियां बड़े छोटे आयु से ही बुनकारी की कुशलता से ओतप्रोत होजाती हैं. इनको अपने समाज में एक बेहतर एवं कुशल कारीगर के रूप में उद्योग में सहायता एवं बढ़ावा देने की क्षमता के रूप में देखा जाता है. इनका विवाह भी मुख्यतः कम आयु में ही किया जाता है और इनके लिए वर भी नगर के ही किसी दुसरे मोहल्ले में ढूढा जाता है. ये प्रथा जातिवादी एवं कुशल कारीगर को नगर के भीतर ही खपाने की कवायद जैसा ही है. जातिवादी मुस्लिम जैसे कि शेख़, सय्यद एवं पठानो में इनका विवाह नहीं होता.

सरकारी तंत्र एवं पुरुष प्रधान समाज इनके बहुमूल्य जीवन को मुख्य धारा मे न लाने हेतु परस्पर ज़िम्मेदार है. सरकारी निष्क्रियता जोकि आधारभूत सुविधाओं जैसेकि स्कूल, कॉलेज, पोलिटेक्निक एवं अस्पताल जैसी सुविधाएँ देने में असफल है समाज के पुरुषप्रधान ढांचे को ही बल देता है. नगर में सेक्युलर स्पेसेस जैसे कि पार्क इत्यादि की कोई व्यस्था नहीं है जहाँ ये वर्ग कुछ समय बिता सके पर नगर में कम्युनल स्पेसेस की भरमार है जैसे की मुहर्रम मैदान, रामलीला ग्राउंड इत्यादि जोकि पुरुष प्रधान समाज से संचालित होते हैं. बुनकर महिलाओं का जीवन मुख्यतः संकरी गलियों में बने घरों की जुगाड़ लूम मशीन के इर्द गिर्द या घरेलु कार्यों में ही व्यतीत होता है. लूमों की खटर पटर की धुन मानो इन महिलाओं को एक जटिल परिवेश में थोपा हुआ संगीतमय जीवन देता हो.

Waqar is a second year student of the MA in Development Studies programme at TISS, Mumbai.

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